देशमुख आगे लिखते हैं, "तैरने के दौरान सावरकर को चोट लगी और उससे ख़ून
बहने लगा. सुरक्षाकर्मी भी समुद्र में कूद गए और तैर कर उनका पीछा करने
लगे."
"सावरकर करीब 15 मिनट तैर कर तट पर पहुंच गए. तट रपटीला था. पहली बार तो वो फिसले लेकिन दूसरे प्रयास में वो ज़मीन पर पहुंच गए. वो तेज़ी से दौड़ने लगे और एक मिनट में उन्होंने करीब 450 मीटर का फ़ासला तय
किया."
"उनके दोनों तरफ़ ट्रामें और कारें दौड़ रही थीं. सावरकर क़रीब क़रीब नंगे थे. तभी उन्हें एक पुलिसवाला दिखाई दिया. वो उसके पास जा कर अंग्रेज़ी में बोले, 'मुझे राजनीतिक शरण के लिए मैजिस्ट्रेट के पास ले
चलो.' तभी उनके पीछे दौड़ रहे सुरक्षाकर्मी चिल्लाए, 'चोर! चोर! पकड़ो
उसे.' सावरकर ने बहुत प्रतिरोध किया, लेकिन कई लोगों ने मिल कर उन्हें पकड़
ही लिया."
इस तरह सावरकर की कुछ मिनटों की आज़ादी ख़त्म हो गई और अगले 25 सालों तक वो किसी न किसी रूप में अंग्रेज़ों के क़ैदी रहे.
उन्हें 25-25 साल की दो अलग-अलग सजाएं सुनाई गईं और सज़ा काटने के लिए भारत से दूर अंडमान यानी 'काला पानी' भेज दिया गया.
उन्हें 698 कमरों की सेल्युलर जेल में 13.5 गुणा 7.5 फ़ीट की कोठरी नंबर 52 में रखा गया.
वहाँ
के जेल जीवन का ज़िक्र करते हुए आशुतोष देशमुख, वीर सावरकर की जीवनी में
लिखते हैं, "अंडमान में सरकारी अफ़सर बग्घी में चलते थे और राजनीतिक कैदी इन बग्घियों को खींचा करते थे."
"वहाँ ढंग की सड़कें नहीं होती थीं
और इलाक़ा भी पहाड़ी होता था. जब क़ैदी बग्घियों को नहीं खींच पाते थे तो
उनको गालियाँ दी जाती थीं और उनकी पिटाई होती थी. परेशान करने वाले कैदियों को कई दिनों तक पनियल सूप दिया जाता था."
"उनके अलावा उन्हें कुनैन पीने के लिए भी मजबूर किया जाता था. इससे उन्हें चक्कर आते थे. कुछ लोग
उल्टियाँ कर देते थे और कुछ को बहुत दर्द रहता था."
देशमुख आगे लिखते हैं, "सभी कैदियों को शौचालय ले जाने का समय नियत रहता
था और शौचालय के अंदर भी उन्हें तय समय-सीमा तक रहना होता था."
"कभी-कभी कैदी को जेल को जेल के अपने कमरे के एक कोने में ही मल त्यागना पड़ जाता था."
"जेल
की कोठरी की दीवारों से मल और पेशाब की बदबू आती थी. कभी कभी कैदियों को खड़े खड़े ही हथकड़ियाँ और बेड़ियाँ पहनने की सज़ा दी जाती थी."
"उस दशा में उन्हें खड़े खड़े ही शौचालय का इस्तेमाल करना पड़ता था. उल्टी करने के दौरान भी उन्हें बैठने की इजाज़त नहीं थी."
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