11 अप्रैल 1975 को जगन्नाथ मिश्रा पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने थे. यह उनके लिए बहुत कठिन वक़्त था क्योंकि इसी साल 3 जनवरी को उनके बड़े
भाई और तत्कालीन रेल मंत्री ललित नारायण मिश्रा की हत्या समस्तीपुर ज़िले
में कर दी गई थी.
उनके मुख्यमंत्री बनने से ठीक एक साल पहले मार्च 1974 में बिहार में छात्र आंदोलन की शुरुआत हुई थी, जिसे बाद में जेपी
आंदोलन के नाम से जाना गया.
अब्दुल ग़फ़ूर के बाद जब वो पहली बार मुख्यमंत्री बने थे, तब उनकी उम्र महज़ 38 साल थी. उन्हें तब देश का सबसे युवा मुख्यमंत्री बनने का दर्जा
मिला था.
वो इस पद पर 30 अप्रैल, 1977 तक बने रहे. उस वक़्त केंद्र
में जनता पार्टी की सरकार थी और उसने राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया था.
इसके बाद देश के नौ राज्यों में चुनाव कराए गए थे. 21 महीने के आपातकाल के
बाद जनता पार्टी की सरकार सत्ता में आई थी.
1970 के दशक के मध्य में बिहार सभी कांग्रेस विरोधी आंदोलनों का केंद्र रहा था. उस वक़्त राजनीति
में नौसिखिए माने जा रहे जगन्नाथ मिश्रा को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा
गांधी ने बड़ी ज़िम्मेदारियां दी थीं.
1980 के चुनावों में इंदिरा गांधी की जीत के बाद उत्तर भारत के कई राज्यों में दोबारा चुनाव हुए. बिहार में कांग्रेस की जीत के बाद जगन्नाथ मिश्रा को फिर से मुख्यमंत्री बनने का
मौक़ा मिला. उन्होंने दूसरी बार 8 जून 1980 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली
और 1983 में स्वतंत्रता दिवस के एक दिन पहले यानी 14 अगस्त को उन्हें यह पद
छोड़ना पड़ा.
गांधी परिवार के विश्वस्त होने के बावजूद उन्होंने बिहार में कांग्रेस के भीतर कई प्रतिद्वंद्वी पैदा कर लिए थे.
अपने
दूसरे कार्यकाल के दौरान उन्होंने राज्य के कई ज़िलों में उर्दू को दूसरी
आधिकारिक भाषा की मान्यता दी थी. इस फ़ैसले के बाद राज्य में सैंकड़ों उर्दू ट्रांसलेटरों की नियुक्तियां हुईं थीं.
जुलाई 1982 में जगन्नाथ मिश्रा राज्य की विधानसभा में कुख्यात बिहार
प्रेस बिल लेकर आए और उसे सदन से पास करवाया गया. वो इंदिरा गांधी को खुश करने के लिए यह बिल लेकर आए थे, जिसके बाद प्रेस कानूनों का उल्लंघन करने
वाले पत्रकारों के लिए सज़ा का प्रावधान किया गया था.
देशभर के पत्रकारों ने इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई और इस क़ानून को आपातकाल के काले
दिनों से जोड़ा गया. इसके विरोध में हज़ारों अख़बारों ने अपने संस्करणों को
बंद कर दिया.
एक साल बाद भारी विरोधों के कारण राष्ट्रपति की मुहर लगने से पहले यह बिल वापस ले लिया गया.
जगन्नाथ मिश्रा ने बिहार के साथ भेदभाव और उसकी उपेक्षा का मुद्दा उठाया, जिसके बाद उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटा दिया गया. उन्होंने अपने एक भाषण में
दावा किया था कि राज्य को जितना पैसा मिलना चाहिए, उतना नहीं दिया जा रहा
है.
फ़रवरी 1990 में विधासनभा चुनाव कराए गए, जिसमें राष्ट्रीय जनता दल के लालू प्रसाद यादव कांग्रेस को बिहार की सत्ता से बेदख़ल करने में कामयाब रहे. 10 मार्च 1990 को लालू प्रसाद यादव ने बिहार के नए मुख्यमंत्री पद की
शपथ ली.
और इस तरह जगन्नाथ मिश्रा बिहार के अंतिम कांग्रेसी
मुख्यमंत्री साबित हुए. कांग्रेस इसके बाद कभी भी ख़ुद के दम पर बिहार की
सत्ता पर काबिज नहीं हो पाई.
लालू प्रसाद यादव और जगन्नाथ मिश्रा राजनीतिक प्रतिद्वंदी थे, बावजूद इसके दोनों में कई समानता थी. जनवरी 1996
के चारा घोटाले में दोनों के नाम सामने आए. घोटाले से जुड़े एक मामले में
वे दोनों दोषी पाए गए.
दोनों कभी राज्य की अल्पसंख्यक राजनीति के
चैंपियन माने जाते थे और हमेशा बिहार की उपेक्षा का मुद्दा उठाते रहे.
हालांकि एक वक़्त ऐसा भी आया जब उन्हें राजनीतिक मजबूरी के कारण अपनी पार्टी छोड़नी पड़ी.
उन्होंने उस पार्टी को छोड़ा जिसने उन्हें राज्य का तीन बार मुख्यमंत्री बनाया था और उन लोगों से हाथ मिला लिया,
जिनका वो कभी ज़ोरदार विरोध किया करते थे.
अविभाजित बिहार तब देश में खनिजों का सबसे बड़ा उत्पादक था.
मुख्यमंत्री
पद से हटाए जाने के बाद भी वो बिहार की उपेक्षा का मुद्दा उठाते रहे. वो
अपनी पार्टी के भीतर एक गुट बनाने में कामयाब रहे जो हमेशा उनके पीछे खड़ा रहता था.
साल 1989 में हुए भागलपुर दंगों के बाद कांग्रेस पार्टी का
सूरज डूबने लगा. केंद्र में कांग्रेस की हार और वी.पी. सिंह सरकार बनने के
बाद राजीव गांधी ने स्थिति को देखते हुए छह साल बाद जगन्नाथ मिश्रा को एक
बार फिर बिहार का मुख्यमंत्री बनाया, लेकिन यह बहुत कमाल नहीं कर पाया.
इन
छह सालों में बिहार को चार मुख्यमंत्री मिल चुके थे. जगन्नाथ मिश्रा को मुसलमानों का समर्थन हासिल था और राजीव गांधी को मजबूर होकर उन्हें
मुख्यमंत्री बनाना पड़ा था.
भागलपुर दंगों के कारण बिहार के मुसलमान
कांग्रेस से काफ़ी ख़फ़ा थे. मुसलमान मान रहे थे कि तत्कालीन मुख्यमंत्री सत्येंद्र सिन्हा भागलपुर दंगों की जांच कराने में नाकाम रहे हैं. इसका
ख़ामियाज़ा पार्टी को आगामी चुनावों में भुगतना पड़ा.
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